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शुक्रवार, 08 मई 2026

सतुआनी और जुड़ शीतल पर्व 2026: बिहार और मिथिला का पारंपरिक उत्सव

सतुआनी और जुड़ शीतल पर्व 2026: बिहार और मिथिला का पारंपरिक उत्सव

सतुआनी और जुड़ शीतल पर्व 2026: बिहार और मिथिला का पारंपरिक उत्सव

68 Visited Festival • Updated: Friday, 03 April 2026

सतुआनी और जुड़ शीतल पर्व 2026: बिहार और मिथिला का पारंपरिक उत्सव


वर्ष 2026 में सतुआनी और जुड़ शीतल का पर्व 14 और 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। ये त्यौहार विशेष रूप से बिहार और मिथिला क्षेत्र में नई फसल के आगमन और गर्मी के मौसम के स्वागत का प्रतीक हैं। इस पर्व में भोजन, पूजा, और पारंपरिक रीति-रिवाजों के माध्यम से शरीर और मन को ठंडा रखने का संदेश छिपा है।


महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त (2026)

  • सतुआनी (Satuaan): 14 अप्रैल, 2026 (मंगलवार)

    • मेष संक्रांति क्षण: सुबह 09:39 बजे

    • पुण्य काल मुहूर्त: सुबह 06:09 से दोपहर 01:03 तक

  • जुड़ शीतल (Jur Sital): 15 अप्रैल, 2026 (बुधवार)


1. सतुआनी और मेष संक्रांति (14 अप्रैल)

सतुआनी का पर्व मेष संक्रांति के दिन मनाया जाता है, जब सूर्य मीन राशि छोड़कर मेष राशि में प्रवेश करता है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह ‘खरमास’ के समापन और शुभ कार्यों की शुरुआत का प्रतीक है।

सतुआनी की परंपराएं

  1. सत्तू का सेवन:
    इस दिन सत्तू (भुने हुए चने/जौ का आटा), गुड़, और कच्चे आम का सेवन किया जाता है। सत्तू की तासीर ठंडी होती है, जो शरीर को आने वाली भीषण गर्मी के लिए तैयार करती है।

  2. दान-पुण्य:
    मिट्टी के घड़े (कलश), सत्तू, पंखा और मौसमी फलों का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

  3. पवित्र स्नान:
    श्रद्धालु गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्य देव की पूजा करते हैं। यह शरीर और मन की शुद्धि का प्रतीक है।


2. जुड़ शीतल - मैथिली नव वर्ष (15 अप्रैल)

जुड़ शीतल मिथिला क्षेत्र का नया साल (Aakhar Bochhor) है। 'जुड़' का अर्थ है जुड़ना या शीतल होना, और यह पर्व प्रकृति और जल के संरक्षण को समर्पित है।

जुड़ शीतल की परंपराएं

  1. बासी भोजन की परंपरा:
    इस दिन ताज़ा भोजन नहीं बनाया जाता। लोग एक दिन पहले (सतुआनी की रात) बना हुआ ‘बासी भात और बड़ी’ (lentil dumplings with rice) खाते हैं।

  2. चूल्हा विश्राम:
    रसोई के चूल्हे (चूल्हा महारानी) को विश्राम दिया जाता है और उसकी पूजा की जाती है।

  3. शीतलता का आशीर्वाद:
    घर के बुजुर्ग अपने से छोटे बच्चों के सिर पर बासी पानी की बूंदें छिड़ककर “जुड़ायब” (ठंडा रहने) का आशीर्वाद देते हैं। यही प्रक्रिया पौधों और पालतू जानवरों के साथ भी की जाती है।

  4. कीचड़ की होली:
    कुछ क्षेत्रों में धूल और कीचड़ से होली खेलने की परंपरा है, जिसे गर्मी से राहत पाने का प्रतीकात्मक तरीका माना जाता है।


सतुआनी और जुड़ शीतल का महत्व

  • यह पर्व प्रकृति, जल, और फसल के महत्व को दर्शाता है।

  • शरीर की शीतलता और स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थ और परंपराएं अपनाई जाती हैं।

  • समाज और परिवार में एकता और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देता है।


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