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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

हरतालिका तीज 2026: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस व्रत का महत्व

हरतालिका तीज 2026: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस व्रत का महत्व

हरतालिका तीज 2026: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस व्रत का महत्व

44 Visited Festival • Updated: Saturday, 12 September 2026

हरतालिका तीज 2026: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस व्रत का महत्व


हिंदू धर्म में हरतालिका तीज को अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का सबसे बड़ा व्रत माना गया है। यह व्रत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। साल 2026 में हरतालिका तीज 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी।

यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए और कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए पूरी तरह निराहार और निर्जला (बिना पानी के) रखती हैं। आइए जानते हैं साल 2026 की हरतालिका तीज का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसका धार्मिक महत्व।


हरतालिका तीज 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में तृतीया तिथि दो दिन व्याप्त रहेगी, लेकिन उदया तिथि के नियमों के कारण व्रत 14 सितंबर को ही मान्य होगा।

  • तृतीया तिथि का प्रारंभ: 13 सितंबर 2026 को सुबह 07:08 बजे से
  • तृतीया तिथि की समाप्ति: 14 सितंबर 2026 को सुबह 04:36 बजे तक
  • मुख्य व्रत की तारीख: 14 सितंबर 2026, सोमवार (उदया तिथि के अनुसार)
  • विशेष संयोग: इसी दिन गणेश चतुर्थी का महापर्व भी मनाया जाएगा, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ गया है।


हरतालिका तीज की सरल पूजा विधि

हरतालिका तीज की पूजा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में करना सबसे उत्तम माना जाता है।

1. पूजा की तैयारी

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए या साफ कपड़े (संभव हो तो लाल या हरे रंग के) पहनें।
  • पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प लें।

2. बालू के महादेव की स्थापना

  • शाम के समय पूजा स्थान को साफ करके फूलों से मंडप सजाएं।
  • मिट्टी या बालू (रेत) से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मूर्तियां अपने हाथों से बनाएं।

3. मुख्य पूजा और श्रृंगार

  • माता पार्वती को सुहाग की सभी सामग्रियां (सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, मेहंदी, महावर आदि) अर्पित करें।
  • भगवान शिव को धोती, अंगोछा, बेलपत्र, भांग, धतूरा और सफेद फूल चढ़ाएं।
  • धूप, दीप जलाकर हरतालिका तीज व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।

4. रात का जागरण

  • इस व्रत में रात को सोना वर्जित माना जाता है। महिलाएं रात भर जागकर भजन-कीर्तन करती हैं।
  • अगले दिन सुबह आरती के बाद माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं और ककड़ी या हलवे का भोग लगाकर अपना व्रत खोलें (पारण करें)।

इस व्रत का पौराणिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए किया था। उन्होंने गंगा नदी के तट पर बिना अन्न-जल के घोर तपस्या की थी।

'हरतालिका' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— हरत (हरण) और आलिका (सखी)। माता पार्वती की सखियां उन्हें उनके पिता के घर से हरण करके घने जंगल में ले गई थीं ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न हो सके। जंगल में रहकर ही माता पार्वती ने यह कठिन व्रत किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।


व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य जरूरी बातें

  • निर्जला नियम: यह व्रत पूरी तरह निर्जला रखा जाता है। स्वास्थ्य ठीक न होने की स्थिति में ही फलाहार की अनुमति होती है।
  • क्रोध से बचें: व्रत के दिन मन को शांत रखें, किसी से वाद-विवाद न करें और न ही किसी की निंदा करें।
  • एक बार शुरू तो हमेशा: इस व्रत को एक बार शुरू करने के बाद छोड़ा नहीं जाता। यदि किसी कारणवश महिला व्रत नहीं कर पा रही है, तो परिवार की दूसरी महिला इसे निभाती है।


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