अनंत चतुर्दशी
18 Visited Festival • Updated: Monday, 21 September 2026

धर्म, आस्था और उत्सव का अनूठा संगम है अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi)! यह पावन पर्व न केवल भगवान विष्णु के 'अनंत' (सृष्टि के रचयिता) रूप की आराधना को समर्पित है, बल्कि इसी दिन 10 दिनों से चले आ रहे गणेशोत्सव का समापन यानी गणपति विसर्जन भी होता है।
अगर आप जानना चाहते हैं कि अनंत चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है, इसका क्या महत्व है, यह साल 2026 में कब है, और इसके पीछे की पौराणिक कहानी क्या है, तो इस ब्लॉग पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़ें।
📅 अनंत चतुर्दशी 2026: कब है और शुभ मुहूर्त?
हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी मनाई जाती है। इस साल 25 सितंबर 2026, शुक्रवार को यह पर्व पूरे देश में अत्यंत धूमधाम से मनाया जा रहा है।
- चतुर्दशी तिथि शुरू: 24 सितंबर 2026, रात 11:18 बजे से
- चतुर्दशी तिथि समाप्त: 25 सितंबर 2026, रात 11:06 बजे तक
- पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त: 25 सितंबर को सुबह 06:11 बजे से सुबह 11:06 बजे तक।
🔱 अनंत चतुर्दशी 'क्या है' और क्यों बांधी जाती है 14 गांठें?
इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है। पूजा के दौरान एक विशेष रेशमी या सूती धागा तैयार किया जाता है, जिसे 'अनंत सूत्र' कहते हैं।
इस धागे में 14 गांठें लगाई जाती हैं। ये 14 गांठें भगवान विष्णु द्वारा बनाए गए 14 लोकों (जैसे भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक आदि) का प्रतीक हैं। पूजा के बाद पुरुष इस रक्षा सूत्र को अपने दाहिने हाथ पर और महिलाएं बाएं हाथ पर बांधती हैं। माना जाता है कि इसे बांधने से संकट टल जाते हैं और सुख-समृद्धि आती है।
📖 पौराणिक व्रत कथा: आखिर क्यों शुरू हुई यह परंपरा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत सतयुग में हुई थी। इसकी सबसे प्रचलित कहानी महाभारत काल और सत्यवादी सुशीला से जुड़ी है:
कथा की शुरुआत:
प्राचीन काल में सुमंत नाम के एक तपस्वी ब्राह्मण थे। उनकी पुत्री का नाम सुशीला था, जो अत्यंत संस्कारी और धार्मिक थीं। सुशीला का विवाह कौंडिल्य ऋषि से हुआ। विवाह के बाद जब सुशीला अपने पति के साथ आश्रम जा रही थीं, तो उन्होंने नदी किनारे कुछ महिलाओं को पूजा करते देखा।
अनंत सूत्र की महिमा:
सुशीला ने महिलाओं से पूछा कि वे क्या कर रही हैं। महिलाओं ने बताया कि वे अनंत भगवान का व्रत रख रही हैं और उन्होंने सुशीला को इसकी महिमा बताई। सुशीला ने भी पूरी श्रद्धा से व्रत रखा और अपने हाथ पर 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांध लिया। इस व्रत के प्रभाव से कौंडिल्य ऋषि का आश्रम धन-धान्य और समृद्धि से भर गया।
ऋषि का अहंकार और संकट:
एक दिन कौंडिल्य ऋषि की नजर सुशीला के हाथ में बंधे उस डोरे (धागे) पर पड़ी। अहंकार वश उन्होंने सोचा कि सुशीला ने उन्हें वश में करने के लिए कोई जादू-टोना किया है। सुशीला के मना करने के बाद भी ऋषि ने उस पवित्र धागे को तोड़कर आग में फेंक दिया।
भगवान के इस अपमान के कारण ऋषि की सारी संपत्ति, मान-सम्मान और सुख-शांति धीरे-धीरे नष्ट हो गई। वे पूरी तरह दरिद्र हो गए।
क्षमा और पुनरुद्धार:
जब कौंडिल्य ऋषि को अपनी भूल का अहसास हुआ, तो वे भगवान अनंत की खोज में जंगलों में भटकने लगे। उनकी पश्चाताप की अग्नि को देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए। भगवान ने ऋषि को माफ करते हुए कहा कि यदि वे 14 वर्षों तक लगातार अनंत चतुर्दशी का व्रत रखेंगे, तो उनका खोया हुआ वैभव वापस मिल जाएगा। ऋषि कौंडिल्य ने ऐसा ही किया और वे पुनः सुखी और समृद्ध हो गए।
🪵 महाभारत काल में इसका महत्व
जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर जंगलों में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इसी अनंत चतुर्दशी व्रत को रखने की सलाह दी थी। श्रीकृष्ण के कहे अनुसार पांडवों ने यह व्रत पूरी निष्ठा से किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें महाभारत के युद्ध में विजय मिली और उनका खोया हुआ राज्य वापस मिला।
🌊 बप्पा की विदाई (गणेश विसर्जन)
अनंत चतुर्दशी का एक और सबसे बड़ा आकर्षण है गणपति बप्पा की विदाई। 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' के जयकारों के साथ भक्त नम आंखों से भगवान गणेश की मूर्तियों को नदियों, सरोवरों या समुद्र में विसर्जित करते हैं।
इस प्रकार, यह दिन हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितना भी बड़ा संकट क्यों न आए, यदि हम ईश्वर पर अटूट विश्वास रखें और अधर्म का मार्ग छोड़ दें, तो 'अनंत' भगवान हमारी नैया पार लगा ही देते हैं।
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