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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

अनंत चतुर्दशी की संपूर्ण व्रत कथा

अनंत चतुर्दशी की संपूर्ण व्रत कथा

अनंत चतुर्दशी की संपूर्ण व्रत कथा

19 Visited Festival • Updated: Monday, 21 September 2026

अनंत चतुर्दशी की संपूर्ण व्रत कथा


अनंत चतुर्दशी की संपूर्ण व्रत कथा

प्राचीन काल में सुमंत नाम के एक तपस्वी और सदाचारी ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था, जो अत्यंत पतिव्रता एवं धर्मपरायणा थीं। सुमंत और दीक्षा के घर एक अत्यंत रूपवती, गुणवती और धर्मनिष्ठ कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम शीला (सुशीला) रखा गया।

शीला जब अभी छोटी ही थी, तभी उसकी माता दीक्षा का असामयिक निधन हो गया। इसके बाद सुमंत मुनि ने कर्कशा नाम की स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। जैसा उसका नाम था, वैसा ही उसका स्वभाव था—अत्यंत क्रोधी, ईर्ष्यालु और कठोर। कर्कशा शीला से द्वेष रखती थी और उसे भांति-भांति के कष्ट देती थी, परंतु शीला ने कभी धैर्य नहीं खोया और सदा धर्म के मार्ग पर चलती रही।

जब शीला विवाह योग्य हुई, तब सुमंत मुनि ने उसका विवाह उच्च कुलीन, ज्ञानी और तेजस्वी ऋषि कौंडिन्य के साथ कर दिया। विदाई के समय कर्कशा ने दामाद और पुत्री को आशीर्वाद देने के बजाय केवल ईंट-पत्थर के टुकड़े और छाछ की खट्टी बूंदे पाथेय (रास्ते के भोजन) के रूप में दीं। कौंडिन्य मुनि शांत भाव से अपनी पत्नी शीला को लेकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े।

यात्रा के दौरान दोपहर के समय वे एक मनोरम नदी के तट पर पहुंचे। कौंडिन्य मुनि मध्याह्न संध्या और तर्पण करने चले गए। तभी शीला ने देखा कि नदी तट पर बहुत सी सुहागिन स्त्रियां सुंदर लाल वस्त्र पहनकर भक्तिभाव से किसी देवता का पूजन कर रही थीं।

जिज्ञासावश शीला ने उनके पास जाकर पूछा—"हे माताओं! आप सब मिलकर यह किस देवता का व्रत और पूजन कर रही हैं? इस व्रत का क्या फल है और इसकी विधि क्या है?"

उन स्त्रियों में से एक ने स्नेहपूर्वक बताया—"पुत्री! आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी है और हम सर्वव्यापी, दयालु भगवान श्री अनंत (विष्णु) का व्रत कर रहे हैं। इस व्रत में रेशम या सूत के धागे में 14 गांठें लगाकर, उसे कुमकुम से रंगकर भगवान को अर्पित किया जाता है और फिर अपनी भुजा पर धारण किया जाता है। इस व्रत के प्रभाव से दरिद्रता, संकट और पापों का नाश होता है तथा साधक को अखंड सौभाग्य, धन-धान्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।"

शीला ने वहीं श्रद्धापूर्वक अनंत देव का पूजन किया, 14 गांठों वाला अनंत सूत्र अपनी बाईं कलाई पर बांधा और अपने हिस्से का प्रसाद लेकर मुनि कौंडिन्य के पास लौट आई।

भगवान अनंत के इस व्रत का ऐसा अद्भुत प्रभाव हुआ कि कौंडिन्य मुनि का आश्रम देखते ही देखते धन-धान्य, गायों, सेवक-शिष्यों और दिव्य संपदा से परिपूर्ण हो गया। चारों ओर उनकी कीर्ति फैल गई।

एक दिन जब कौंडिन्य मुनि विश्राम कर रहे थे, तो उनकी दृष्टि शीला के हाथ में बंधे लाल रेशमी अनंत डोरे पर पड़ी। मुनि ने अहंकार और अज्ञानवश पूछा—"शीला! तुमने यह हाथ में क्या बांध रखा है? क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए कोई जादू-टोना या तंत्र-मंत्र किया है?"

शीला ने अत्यंत विनीत भाव से कहा—"स्वामी! यह कोई जादू-टोना नहीं है। यह तो जगत् के स्वामी भगवान अनंत का रक्षा सूत्र है, जिनकी कृपा से आज हमारे घर में यह समस्त ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि विद्यमान है।"

किंतु अहंकार के वशीभूत कौंडिन्य मुनि को क्रोध आ गया। उन्होंने शीला की बात अनसुनी कर दी और बलपूर्वक उस पावन अनंत सूत्र को उसकी कलाई से तोड़ लिया और पास जल रही यज्ञ की अग्नि में फेंक दिया।

भगवान के पवित्र सूत्र का अपमान होते ही कौंडिन्य मुनि का सारा पुण्य नष्ट हो गया। देखते ही देखते उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई, गोशाला की गायें मर गईं, अन्न के भंडार समाप्त हो गए, संबंधी साथ छोड़ गए और आश्रम वीरान हो गया। वे घोर दरिद्रता और भूख-प्यास के संकट में फंस गए।

तब मुनि को अपनी भूल और अहंकार का भान हुआ। वे समझ गए कि यह सब भगवान अनंत के अनादर का ही दुष्परिणाम है। पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए कौंडिन्य मुनि भगवान अनंत की खोज में वनों में निकल पड़े।

रास्ते में उन्हें एक आम का विशाल वृक्ष मिला जो फलों से लदा था, परंतु कोई पक्षी या जीव उसका फल नहीं छूता था। मुनि ने पूछा—"हे वृक्षराज! क्या आपने कहीं भगवान अनंत को देखा है?"

वृक्ष ने कहा—"नहीं मुनिराज, मैंने उन्हें नहीं देखा।"

आगे जाने पर उन्हें हरी घास के मैदान में एक गाय और बछड़ा मिले जो घास नहीं चर रहे थे, फिर एक विशाल बैल मिला जो बिना खेत जोते खड़ा था, फिर दो सुंदर कमलों से भरे सरोवर मिले जिनका पानी कोई नहीं पीता था, फिर एक गधा और एक हाथी मिले। मुनि ने सबसे भगवान अनंत का पता पूछा, परंतु किसी ने उनका पता नहीं बताया।

थक-हारकर, भूख-प्यास से व्याकुल होकर जब कौंडिन्य मुनि "हे अनंत! हे दीनानाथ! रक्षा करो!" पुकारते हुए भूमि पर गिर पड़े, तब भगवान श्रीहरि अत्यंत द्रवित हो उठे। भगवान ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर मुनि का हाथ पकड़ा और उन्हें एक दिव्य गुफा के रास्ते क्षीरसागर में ले गए।

वहां कौंडिन्य मुनि ने शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान श्रीहरि अनंत के साक्षात दर्शन किए। मुनि उनके चरणों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगे और क्षमा याचना की।

भगवान विष्णु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा—"हे कौंडिन्य! तुमने अज्ञानतावश मेरे सूत्र का अपमान किया था, उसी कारण तुम्हें यह दारुण कष्ट भोगना पड़ा। मार्ग में तुम्हें जो मिला, वे सब कर्मों के फल थे:

    आम का वृक्ष: पूर्वजन्म का एक विद्वान ब्राह्मण था, जिसने अपना ज्ञान किसी को नहीं बांटा।

    गाय-बछड़ा: वह भूमि थी जिसने केवल बीज ग्रहण किया, दान नहीं दिया।

    बैल: स्वयं धर्म था।

    दोनों सरोवर: वे दो सगी बहनें थीं जो दान का दिखावा करती थीं परंतु किसी भूखे को अन्न नहीं देती थीं।

    गधा और हाथी: क्रोध और अभिमान के प्रतीक थे।

अब तुम अपने आश्रम लौट जाओ और अपनी पत्नी शीला के साथ मिलकर 14 वर्षों तक निरंतर विधिपूर्वक अनंत चतुर्दशी का व्रत करो। इससे तुम्हारे समस्त पाप कट जाएंगे और तुम्हें खोया हुआ ऐश्वर्य पुनः प्राप्त होगा।"

कौंडिन्य मुनि ने आश्रम लौटकर पत्नी शीला के साथ भक्तिभाव से 14 वर्षों तक अखंड अनंत व्रत किया। भगवान अनंत की अनुकंपा से उनका घर पुनः समस्त सुख-वैभव से भर गया और अंत समय में वे सपरिवार वैकुंठ लोक को प्राप्त हुए।

    ॥ इति श्री अनंत चतुर्दशी व्रत कथा संपूर्णम् ॥


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